Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
दीया थकता है क्या
कदंब के नीचे · बरसों बाद, उसी साँझ
सूत्रधार: बात अधूरी रह गई। और उसी साँझ, सैकड़ों कोस दूर, वृंदावन के कदंब के नीचे एक दीया जल रहा था। जैसे बरसों से हर साँझ जलता था।
ललिता: आज भी पोंछ रही हो? कल ही तो पोंछी थी, राधा।
राधा: कल की धूल कल की थी, ललिता।
ललिता: इतने बरस हो गए। मंगलू का ब्याह हो गया, धौली की बछिया भी अब बूढ़ी हो चली। तुम थकती नहीं?
राधा: दीया थकता है क्या, ललिता? बस जलता है।
ललिता: पर दीये में तेल तो डालना पड़ता है।
राधा: वह भी रोज़ पड़ जाता है। कभी मैया के माखन से, कभी गायों की घंटी से, कभी तुम्हारी इसी बात से।
ललिता: मेरी बात से?
राधा: हाँ। जब तुम पूछती हो, थकती नहीं, तो मुझे याद आ जाता है कि मैं यहाँ क्यों बैठी हूँ।
ललिता: क्यों बैठी हो?
राधा: क्योंकि उन्होंने कहा था, सँभालना। और सँभालना एक दिन का काम नहीं होता।
राधा: ...ललिता। सुना?
ललिता: क्या?
राधा: जैसे किसी ने... बहुत दूर से मेरा नाम लिया हो।
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।
