Radha-Krishna: The Flute That Never Played Again
Uddhava arrives with a message. Vrindavan teaches him another language of devotion.
आँखों की आदत
कदंब के नीचे · अँधेरा होते
उद्धव: ढूँढ नहीं रही थीं? तो फिर यह रोज़ साँझ...
राधा: यह आँखों की आदत है, उद्धव जी, मन की नहीं। मन को कहीं जाना ही नहीं पड़ता। वह तो यहीं बैठे हैं। आँखें बेचारी नासमझ हैं, साँझ होते ही राह की ओर मुड़ जाती हैं।
उद्धव: तो आपको... ध्यान की ज़रूरत ही नहीं।
राधा: ध्यान उसका किया जाता है, जिसे भूलने का डर हो। मैं भूलूँ कैसे?
उद्धव: देवी, मैंने बरसों शास्त्र पढ़े। आत्मा, ब्रह्म, माया। पर जो बात आपने एक साँस में कह दी, वह किसी ग्रंथ में इतनी सीधी नहीं मिली।
राधा: वह ग्रंथ से नहीं आई, उद्धव जी। उन्हीं से आई है।
उद्धव: आप उनसे नाराज़ नहीं? एक बार भी?
राधा: नाराज़ उससे होते हैं, जो दूर हो।
सूत्रधार: उद्धव बहुत देर चुप रहे। फिर उनकी नज़र राधा की गोद पर गई।
उद्धव: देवी, एक विनती है। ललिता ने कहा था, आपसे इसे बजाने को न कहूँ। मैं नहीं कहूँगा। बस... क्या मैं इसे एक बार छू सकता हूँ?
राधा: लीजिए। सँभलकर... बहुत हल्की है।
उद्धव: यह... यह किसने बजाई?
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Tradition & source notes
ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड — उद्धव-राधा प्रसंग), गर्ग संहिता, गीत गोविंद व ब्रज की भक्ति परंपरा; अक्रूर-आगमन भागवत 10.39, उद्धव-प्रसंग व भ्रमर-गीत भागवत 10.46–47, कुरुक्षेत्र-मिलन भागवत 10.82 से (भागवत में राधा का नाम नहीं आता)। बाँसुरी राधा को सौंपना और कृष्ण का फिर बाँसुरी न बजाना ब्रज की लोक-परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं।