When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
पितामह गिर गए
हस्तिनापुर का महल · युद्ध की दसवीं रात
संजय: महाराज... पितामह भीष्म गिर गए।
धृतराष्ट्र: गिर गए? जिन्हें कोई जीत नहीं सकता था? किसने गिराया, संजय?
संजय: अर्जुन ने, महाराज।
धृतराष्ट्र: शुरू से बताओ... पहले दिन कुरुक्षेत्र में क्या हुआ था?
संजय: पहले दिन, महाराज... वही अर्जुन धनुष रखकर रो पड़ा था।
धृतराष्ट्र: रो पड़ा था? अर्जुन? तो आज उसके हाथ क्यों नहीं काँपे?
संजय: आज शिखंडी उसके रथ के आगे था। पितामह ने उस पर बाण नहीं उठाया, और उसके पीछे से अर्जुन के बाण आते रहे।
धृतराष्ट्र: और मेरे बेटे? वे कहाँ थे?
संजय: सब देख रहे थे। सूरज ढलने से पहले पितामह रथ से गिरे... पर धरती तक नहीं पहुँचे। इतने बाण धँसे थे कि बाणों पर ही टिक गए।
धृतराष्ट्र: जीवित हैं?
संजय: जीवित हैं। जब तक सूरज उत्तर की ओर नहीं मुड़ता, प्राण नहीं छोड़ेंगे।
धृतराष्ट्र: तो सुनाओ, संजय। धर्म की उस धरती पर, कुरुक्षेत्र में, मेरे बेटों ने और पांडु के बेटों ने क्या किया? एक-एक बात।
संजय: बताऊँगा। पर मैंने वह भी सुना है जो किसी ने नहीं सुना... अर्जुन के रथ के भीतर की बात।
धृतराष्ट्र: तुम तो उस रथ से कोसों दूर थे।
संजय: उन्हीं आँखों से सुना, महाराज... जो आपने लेने से मना कर दिया था।
All chapters (48)
Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)