When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
पुराने कपड़े
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
संजय: नहीं, महाराज। अभी नहीं।
धृतराष्ट्र: तो कृष्ण क्या कहते रहे? कहो।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
श्रीकृष्ण: सर्दी-गर्मी, सुख-दुख, पार्थ, ये आते हैं और चले जाते हैं। इन्हें सह लो। जिसे ये हिला नहीं पाते, वही सच में अमर होने के लायक़ है।
अर्जुन: और जो मारा जाता है, केशव? वह कौन है?
श्रीकृष्ण: न जायते म्रियते वा कदाचित्... आत्मा न कभी जन्मती है, न कभी मरती है। शरीर मारा जाता है, यह नहीं।
श्रीकृष्ण: जैसे आदमी पुराने कपड़े उतारकर नए पहन लेता है, वैसे ही आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया ले लेती है। इसे न शस्त्र काट सकते हैं, न आग जला सकती है, न पानी गला सकता है, न हवा सुखा सकती है।
अर्जुन: तो जो मरते हैं...
श्रीकृष्ण: जो जन्मा है, उसका जाना तय है। जो गया है, उसका आना तय है। जो टल नहीं सकता, उस पर शोक कैसा, पार्थ?
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: जो जन्मा है, उसका जाना तय है...
संजय: महाराज?
धृतराष्ट्र: संजय... सच-सच कहना। इन दस दिनों में मेरे कितने बेटे जा चुके हैं?
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)