When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
कर्म पर हक़
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
श्रीकृष्ण: सुख और दुख को, फ़ायदे और नुक़सान को, जीत और हार को एक-सा मानकर लड़ो, पार्थ। फिर तुम्हें पाप नहीं लगेगा।
अर्जुन: एक-सा? जीत और हार एक-सी कैसे हो सकती है, केशव?
श्रीकृष्ण: जब मन नतीजे से नहीं, काम से बँधा हो। सुनो।
श्रीकृष्ण: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
श्रीकृष्ण: तुम्हारा हक़ बस काम करने पर है, उसके फल पर कभी नहीं। फल को अपने काम की वजह मत बनाओ। और काम न करने से भी मोह मत रखो।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: फल पर हक़ नहीं? फिर कोई काम करे ही क्यों, संजय?
संजय: उस घड़ी, महाराज, अर्जुन के मन में भी यही आया था।
धृतराष्ट्र: मैंने तो सारा जीवन फल के लिए ही जिया। यह राज्य, यह सिंहासन... सब बेटों के लिए।
संजय: और वह फल, महाराज... आज रात आपके हाथ में क्या है?
धृतराष्ट्र: बाणों पर लेटे पितामह।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: तो फिर, केशव, फल की चिंता न हो, तो करने का मन ही क्यों हो? इससे अच्छा है कुछ न करूँ, यहीं बैठा रहूँ—
श्रीकृष्ण: नहीं, पार्थ। यही तो नहीं।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)