When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
पानी का स्वाद
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: मुझमें? पर धागा तो दिखता नहीं, केशव।
श्रीकृष्ण: दिखता है, अगर देखना आए। पानी पियो, तो उसका स्वाद मैं हूँ। सूरज और चाँद की रोशनी मैं हूँ। वेदों में ॐ मैं हूँ। आदमी के भीतर जो हिम्मत है, वह भी मैं हूँ।
अर्जुन: और मरते समय, केशव? जब सब छूट रहा हो, तब आप कैसे याद रहें?
श्रीकृष्ण: आख़िरी घड़ी में आदमी जिसे याद करता है, वहीं पहुँचता है। पर आख़िरी घड़ी में वही याद आता है, जो सारी उम्र याद रहा हो।
श्रीकृष्ण: इसलिए हर समय मुझे याद रखो, पार्थ... और लड़ो।
अर्जुन: और लड़ो... याद भी, और काम भी। दोनों साथ।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात, बारिश
संजय: उस घड़ी, महाराज, अर्जुन के चेहरे पर पहली बार डर नहीं था। एक अजीब-सी शांति थी। जैसे किसी ने भारी बोझ उतार दिया हो।
धृतराष्ट्र: शांति? उसे याद भी करो, और लड़ो भी? संजय, यह कैसा भगवान है जो अपने भक्त को बस पूजा नहीं सिखाता... जो युद्ध के बीच भी—
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)