When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
तीन रस्सियाँ
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: तीन रस्सियाँ? कौन-सी, केशव?
श्रीकृष्ण: पहली है उजाले की रस्सी, सत्त्व। वह आदमी को सुख और समझ से बाँधती है। आदमी सोचता है, मैं अच्छा हूँ, मैं सब जानता हूँ।
श्रीकृष्ण: दूसरी है भागदौड़ की रस्सी, रजस। वह लालसा से बाँधती है। और चाहिए, और करना है, अभी चाहिए।
श्रीकृष्ण: तीसरी है अँधेरे की रस्सी, तमस। आलस, लापरवाही, नींद। आदमी जानता है, फिर भी नहीं उठता।
अर्जुन: और इनसे छूटा कैसे जाए?
श्रीकृष्ण: जो मान-अपमान में, दोस्त-दुश्मन में एक-सा रहे, और मुझे पूरे प्रेम से याद करे, वह तीनों के पार चला जाता है।
श्रीकृष्ण: और याद रखो, पार्थ। आदमी के नाश के तीन दरवाज़े हैं। काम, क्रोध और लोभ। इन तीनों को छोड़ दो।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: लोभ...
संजय: महाराज?
धृतराष्ट्र: पहले दिन अर्जुन ने यही शब्द कहा था, संजय। मेरे बेटों के लिए। कि लोभ ने उनकी आँखों पर पट्टी बाँध दी है। और मैंने उस पर गुस्सा किया था।
संजय: याद है, महाराज।
धृतराष्ट्र: वह ग़लत नहीं था।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)