When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
पितामह का आशीर्वाद
कौरव सेना · भीष्म का रथ
भीष्म पितामह: युधिष्ठिर... अगर तुम ऐसे न आते, तो मैं तुम्हें हार का श्राप दे देता। पर तुम आए। मैं बहुत ख़ुश हूँ, बेटा। जाओ, लड़ो, और जीतो।
युधिष्ठिर: पितामह, आप तो हमारे हैं। फिर उनकी ओर से क्यों?
भीष्म पितामह: आदमी धन का दास होता है, बेटा। धन किसी का दास नहीं होता। बरसों कौरवों का अन्न खाया है। उसने मुझे बाँध रखा है। इसलिए लड़ूँगा उन्हीं की ओर से। पर तुम्हें जो माँगना हो, माँग लो।
युधिष्ठिर: तो पितामह, एक बात बताइए। आपको कोई जीत नहीं सकता। फिर हम आपको कैसे जीतें?
भीष्म पितामह: अभी मेरी मृत्यु का समय नहीं आया, बेटा। फिर कभी आना। तब पूछना।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: फिर कभी आना...?
धृतराष्ट्र: संजय... क्या वे फिर गए?
संजय: गए थे, महाराज। नौवीं रात। पांडव चुपचाप, अँधेरे में, पितामह के डेरे तक गए थे।
धृतराष्ट्र: और? क्या कहा पितामह ने?
संजय: पितामह ने ख़ुद उन्हें अपनी मृत्यु का रास्ता बता दिया, महाराज। कहा, शिखंडी को आगे रखना। मैं उस पर बाण नहीं उठाऊँगा।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)