When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
गुरु का वचन
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: अपनी मृत्यु का रास्ता... ख़ुद? अपने शत्रु को?
संजय: शत्रु नहीं, महाराज। अपने बच्चों को। वे थक चुके थे। शायद वे भी इसी घड़ी का इंतज़ार कर रहे थे।
धृतराष्ट्र: और मेरे बेटे सोचते रहे कि वे उनकी ढाल हैं। आगे कहो। पितामह के बाद युधिष्ठिर कहाँ गया?
कौरव सेना · द्रोण का रथ
संजय: गुरु द्रोण के पास, महाराज। उनकी परिक्रमा की, और पैरों में झुक गया।
युधिष्ठिर: गुरुदेव, आपसे लड़ने की आज्ञा माँगता हूँ। आशीर्वाद दीजिए।
द्रोणाचार्य: तुमने बड़ों का मान रखा, युधिष्ठिर। मैं ख़ुश हूँ। मेरा आशीर्वाद है, तुम जीतोगे।
द्रोणाचार्य: मैं भी उसी धन से बँधा हूँ, बेटा। लड़ूँगा उनकी ओर से। पर मन से तुम्हारी जीत चाहूँगा।
युधिष्ठिर: गुरुदेव, क्षमा करें... पर आपको कैसे जीता जाएगा?
द्रोणाचार्य: जब तक मेरे हाथ में शस्त्र है, मुझे कोई नहीं मार सकता। मैं शस्त्र तब रखूँगा, जब किसी ऐसे आदमी के मुँह से, जिसकी बात पर मुझे पूरा भरोसा हो, कोई बहुत बुरी ख़बर सुनूँगा।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: बहुत बुरी ख़बर? संजय, उस सारी सेना में ऐसा कौन है, जिसकी बात पर द्रोण आँख मूँदकर भरोसा करें?
संजय: एक ही है, महाराज। जो कभी झूठ नहीं बोलता।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)