When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
सामने कौन खड़ा था
कुरुक्षेत्र · दोनों सेनाओं के बीच
अर्जुन: देख रहा हूँ, केशव... वह पितामह हैं। सफ़ेद दाढ़ी, सफ़ेद कवच।
श्रीकृष्ण: और?
अर्जुन: बचपन में इसी गोद में चढ़कर मैंने उन्हें पिताजी कहा था। उन्होंने हँसकर कहा था, मैं तुम्हारा पिता नहीं, बेटा, तुम्हारे पिता का पिता हूँ।
अर्जुन: और उनके पास गुरु द्रोण। जिन्होंने मुझे धनुर्धर बनाया। जिन्होंने पूछा था, अर्जुन, पेड़ पर क्या दिखता है? और मैंने कहा था, बस चिड़िया की आँख।
श्रीकृष्ण: और आज वह आँख किस पर टिकी है, पार्थ?
अर्जुन: आज कुछ नहीं टिकता, केशव। आँख बार-बार फिसल जाती है। वहाँ कृपाचार्य हैं। अश्वत्थामा, बचपन का साथी। मामा, भाई, भतीजे, ससुर, दोस्त...
संजय: उस दिन, महाराज, अर्जुन को सामने कोई शत्रु नहीं दिखा। दोनों ओर उसे बस अपने दिखे।
अर्जुन: केशव... मेरे हाथ-पैर ढीले पड़ रहे हैं। मुँह सूख रहा है। देखिए, मेरा शरीर काँप रहा है... रोंगटे खड़े हो गए हैं।
श्रीकृष्ण: पार्थ?
अर्जुन: केशव, मेरी पकड़... मेरी पकड़ छूट रही है—
धृतराष्ट्र: संजय... यह कैसी आवाज़ थी?
All chapters (48)
Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)