When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
कछुए की तरह
कौरव सेना का अगला मोर्चा · पहले दिन की सुबह
संजय: दुर्योधन अपने रथ पर खड़ा था, महाराज। बार-बार पितामह की ओर देखता, फिर अर्जुन के रथ की ओर।
दुर्योधन: इतनी देर से वहाँ क्या बातें हो रही हैं? पितामह, आप आगे क्यों नहीं बढ़ते? यही मौका है!
भीष्म पितामह: जो धनुष रखकर बैठा हो, उस पर बाण नहीं चलता, दुर्योधन। यह युद्ध का नियम है।
दुर्योधन: नियम! वे नियम मानते तो—
भीष्म पितामह: बस। इंतज़ार करो।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
श्रीकृष्ण: सुनो, पार्थ। जो मन की सारी कामनाएँ छोड़ दे और अपने भीतर ही ख़ुश रहे, उसकी बुद्धि टिकी हुई है। दुख में वह घबराता नहीं। सुख में उसकी लालसा नहीं बढ़ती। मोह, डर और क्रोध उससे दूर रहते हैं।
अर्जुन: और जब दुनिया उसे खींचे?
श्रीकृष्ण: तो वह कछुए जैसा होता है। ख़तरा देखते ही कछुआ अपने अंग भीतर समेट लेता है न? वैसे ही वह अपनी आँख, कान, जीभ, यानी अपनी इंद्रियों को, बाहर की चीज़ों से समेट लेता है।
अर्जुन: और मेरी इंद्रियाँ तो आज हर तरफ़ भाग रही हैं, केशव।
श्रीकृष्ण: सावधान रहना, पार्थ। ये इंद्रियाँ इतनी ताक़तवर हैं कि जतन करने वाले समझदार आदमी का मन भी ज़बरदस्ती खींच ले जाती हैं।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)