When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
शंखों का जवाब
कुरुक्षेत्र · पहले दिन की भोर
भीष्म पितामह: दुर्योधन! चिंता छोड़ दो। जब तक यह बूढ़ा खड़ा है, तुम्हारी सेना खड़ी है।
संजय: और पितामह ने अपना शंख फूँका, महाराज। फिर तो आपकी पूरी सेना में शंख, नगाड़े, ढोल और नरसिंगे एक साथ बज उठे।
धृतराष्ट्र: यह सुनकर तो पांडव काँप गए होंगे।
संजय: उधर, सफ़ेद घोड़ों वाले एक बड़े रथ पर कृष्ण और अर्जुन खड़े थे।
संजय: कृष्ण ने पांचजन्य फूँका। अर्जुन ने देवदत्त। भीमसेन ने अपना भारी शंख पौंड्र। युधिष्ठिर ने अनंतविजय, और नकुल-सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक।
धृतराष्ट्र: और फिर?
संजय: वह आवाज़ धरती और आकाश में गूँज गई, महाराज... और आपके बेटों के दिल चीरती चली गई।
धृतराष्ट्र: बस! यह मत कहो कि वे डर गए।
संजय: मैंने वही कहा जो देखा, महाराज। व्यास जी की आज्ञा है।
धृतराष्ट्र: आगे।
संजय: सेनाएँ बस हिलने वाली थीं। बाण छूटने ही वाले थे। तभी अर्जुन ने अपना गांडीव उठाया। उसके रथ के झंडे पर हनुमान जी बैठे थे। उसने कृष्ण की ओर देखा।
अर्जुन: अच्युत... मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलिए।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)
