When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
सीढ़ी जो नीचे जाती है
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: खींच ले जाती हैं? कहाँ, केशव?
श्रीकृष्ण: नीचे। एक-एक सीढ़ी। आदमी किसी चीज़ के बारे में बार-बार सोचता है, तो उससे लगाव हो जाता है। लगाव से चाह पैदा होती है। चाह पूरी न हो, तो गुस्सा आता है।
श्रीकृष्ण: गुस्से से मोह, मोह से यह याद खो जाती है कि क्या सही है। याद खोई, तो बुद्धि गई। और बुद्धि गई... तो आदमी गया।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: सोचना... लगाव... चाह... गुस्सा...
संजय: महाराज?
धृतराष्ट्र: संजय, यह सीढ़ी... कृष्ण किसकी बात कर रहे थे?
संजय: यह मैं नहीं कह सकता, महाराज। यह हर कोई अपने भीतर देखता है।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
श्रीकृष्ण: पर जो मन को साध ले, वह समुद्र जैसा होता है, पार्थ। सैकड़ों नदियाँ उसमें गिरती हैं, फिर भी वह अपनी जगह नहीं छोड़ता। कामनाएँ आती हैं, पर उसे बहा नहीं पातीं।
अर्जुन: समुद्र...
श्रीकृष्ण: हाँ, पार्थ। समुद्र।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: बस! बहुत हुआ समुद्र और नदियाँ। रात बीत रही है, संजय। मुझे बस इतना बताओ, वह उठा या नहीं?
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)
