When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
पिता का सवाल
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
संजय: महाराज... यह आज मत पूछिए।
धृतराष्ट्र: कितने?
संजय: कई, महाराज। भीमसेन की गदा से।
धृतराष्ट्र: कई... और मुझे अब बताया जा रहा है।
संजय: दस दिन मैं मैदान में था, महाराज। आज पहली बार लौटा हूँ। उस पहली सुबह कृष्ण ने अर्जुन से यही कहा था... शोक से कोई लौटता नहीं।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
श्रीकृष्ण: और अपने धर्म को भी देखो, पार्थ। तुम क्षत्रिय हो। धर्म के लिए होने वाले युद्ध से बड़ा, तुम्हारे लिए कुछ नहीं।
श्रीकृष्ण: आज पीछे हटे, तो लोग बरसों तुम्हारी बदनामी गाएँगे। जिसे दुनिया ने सम्मान दिया हो, उसके लिए बदनामी मौत से बुरी है। ये महारथी सोचेंगे, अर्जुन डरकर भाग गया।
अर्जुन: डरकर? मैं? केशव, आप जानते हैं मैं डरा नहीं हूँ!
श्रीकृष्ण: मैं जानता हूँ। वे नहीं जानेंगे।
अर्जुन: लोग जो कहें, कहें। मुझे न यश चाहिए, न स्वर्ग।
श्रीकृष्ण: अच्छा। तो अब तक मैंने समझ की बात कही। अब करने की बात सुनो, पार्थ... जिसे समझ लिया, तो पाप का यह डर भी कट जाएगा।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)