When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
रथ बीच में
कुरुक्षेत्र · दोनों सेनाओं के बीच
श्रीकृष्ण: बीच में, पार्थ? जहाँ दोनों ओर से बाण पहुँचते हैं?
अर्जुन: वहीं, केशव। मैं एक बार देखना चाहता हूँ कि मुझे किन-किन से लड़ना है। कौन-कौन उस दुर्योधन का भला करने यहाँ आया है।
सूत्रधार: कृष्ण ने लगाम ढीली की। सफ़ेद घोड़े आगे बढ़े। दोनों ओर लाखों आँखें उस एक रथ पर टिक गईं।
धृतराष्ट्र: बीच में? अकेला? मेरे बेटे चाहते तो उसी घड़ी—
संजय: कोई नहीं हिला, महाराज। युद्ध के नियम तय हो चुके थे। और शायद सब देखना चाहते थे कि वह करने क्या जा रहा है।
अर्जुन: थोड़ा और, केशव। वह देखिए, कौरवों का झंडा... वहाँ।
श्रीकृष्ण: मैं देख रहा हूँ, पार्थ।
संजय: और कृष्ण ने रथ रोक दिया। ठीक पितामह भीष्म के सामने। ठीक गुरु द्रोण के सामने।
धृतराष्ट्र: उन्हीं दोनों के सामने? जानबूझकर?
संजय: व्यास जी की दृष्टि से मैं सबके मन पढ़ सकता था, महाराज... पर कृष्ण का मन नहीं।
धृतराष्ट्र: और अर्जुन? उसके मन में क्या था?
संजय: उस घड़ी तक तो बस युद्ध था। धनुष कसा हुआ था, कंधे तने हुए थे।
श्रीकृष्ण: पार्थ... देखो। यहाँ इकट्ठे हुए इन कुरुओं को देखो।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)
