When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
युग-युग में
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
श्रीकृष्ण: न जाने कब से है, यही न? पार्थ, मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म बीत चुके हैं। मैं उन सबको जानता हूँ। तुम नहीं जानते।
अर्जुन: बहुत से जन्म... आपके भी?
श्रीकृष्ण: मैं जन्म से बँधा नहीं हूँ, फिर भी अपनी ही शक्ति से जन्म लेता हूँ। सुनो, क्यों।
श्रीकृष्ण: यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
श्रीकृष्ण: जब-जब धर्म घटता है और अधर्म सिर उठाता है, तब-तब मैं आता हूँ। अच्छे लोगों को बचाने, बुराई मिटाने, और धर्म को फिर से जमाने... मैं हर युग में आता हूँ।
अर्जुन: तो आप... इसीलिए यहाँ हैं? इस रथ पर?
श्रीकृष्ण: तुम्हें क्या लगता है, पार्थ?
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: अधर्म सिर उठाता है, तो वह आता है... संजय, उस दिन वह अधर्मी किसे कह रहा था?
संजय: उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, महाराज।
धृतराष्ट्र: नाम की ज़रूरत भी नहीं थी।
धृतराष्ट्र: संजय... तुम उनके पास थे। तुमने उनकी आँखें देखीं, उनकी आवाज़ सुनी। सच बताओ... क्या कृष्ण सच में भगवान हैं?
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)