When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
एक पल भी नहीं
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
सूत्रधार: अर्जुन ने साँस रोकी। एक पल। दो पल। फिर छाती भारी हुई, और साँस अपने आप छूट गई।
अर्जुन: नहीं रुकती, केशव।
श्रीकृष्ण: यही तो। कोई एक पल भी बिना कर्म के नहीं रह सकता, पार्थ। स्वभाव ही करवा लेता है। साँस लेना, पलक झपकाना... बिना कर्म के तो शरीर भी नहीं चलता।
अर्जुन: और जो सब छोड़कर जंगल में बैठ जाते हैं?
श्रीकृष्ण: जो हाथ-पैर रोककर बैठा रहे, पर मन ही मन उन्हीं चीज़ों को सोचता रहे, वह ख़ुद को धोखा देता है। उससे अच्छा वह है, जो मन को साधकर अपना काम करे, बिना लगाव के। इसलिए अपना तय काम करो, पार्थ।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: तय काम... और राजा का तय काम क्या होता है, संजय?
संजय: न्याय, महाराज। बेटों के लिए भी, भतीजों के लिए भी।
धृतराष्ट्र: आगे कहो।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: पर केशव, क्या कोई ऐसा हुआ है, जिसने राज चलाते हुए, घर-गृहस्थी में रहते हुए, वह पाया हो जिसकी आप बात कर रहे हैं?
श्रीकृष्ण: विदेह के राजा जनक को जानते हो, पार्थ?
All chapters (48)
Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)