When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
गांडीव गिर गया
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
संजय: गांडीव था, महाराज। अर्जुन के हाथ से फिसलकर रथ के तख़्ते पर गिरा था।
धृतराष्ट्र: गांडीव? जिसकी टंकार से देवता भी काँपते थे?
कुरुक्षेत्र · दोनों सेनाओं के बीच
अर्जुन: मेरी त्वचा जल रही है, केशव। मैं खड़ा नहीं रह पा रहा। मन घूम रहा है। चारों ओर बस अपशकुन दिख रहे हैं।
श्रीकृष्ण: कहो, पार्थ। जो मन में है, सब कह दो।
अर्जुन: अपनों को मारकर मुझे कोई भलाई नहीं दिखती। मुझे जीत नहीं चाहिए, केशव। न राज्य, न सुख।
अर्जुन: जिनके लिए हम राज्य चाहते थे, सुख चाहते थे, वही तो सामने खड़े हैं, अपनी जान हथेली पर लेकर। गुरु, पितामह, बेटे, मामा, ससुर, पोते...
अर्जुन: ये मुझे मार भी दें, तब भी मैं इन्हें नहीं मारना चाहता। तीनों लोकों का राज मिले, तब भी नहीं। फिर धरती के एक टुकड़े के लिए?
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: वह लड़ना नहीं चाहता था? संजय... सच में?
संजय: सच में, महाराज। और फिर उसने आपका नाम लिया।
धृतराष्ट्र: मेरा नाम? क्या कहा उसने मेरे बारे में?
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)
