When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
जो कभी नहीं मरता
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
सूत्रधार: दोनों सेनाओं के बीच, शोक में डूबे अर्जुन से कृष्ण जैसे हँसते हुए बोले।
श्रीकृष्ण: पार्थ, जिनका शोक नहीं करना चाहिए, उनका तुम शोक कर रहे हो। और बातें ऐसे कर रहे हो, जैसे बड़े ज्ञानी हो।
अर्जुन: मैंने क्या ग़लत कहा, केशव?
श्रीकृष्ण: समझदार आदमी न जाने वालों का शोक करता है, न रहने वालों का। सुनो। ऐसा कोई समय नहीं था जब मैं नहीं था। जब तुम नहीं थे। जब ये राजा नहीं थे। और ऐसा कोई दिन नहीं आएगा जब हम न रहें।
अर्जुन: पर पितामह का यह शरीर, केशव... बूढ़ा, झुर्रियों वाला। मैं इसी गोद में खेला था।
श्रीकृष्ण: वही गोद पहले एक बच्चे की थी, पार्थ। फिर एक जवान की। अब एक बूढ़े की। जैसे इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा आते हैं, वैसे ही एक दिन दूसरा शरीर आता है। पक्के मन वाला इससे घबराता नहीं। शरीर बदलता है, पर भीतर बैठा जो मैं है, वह वही रहता है। उसी को आत्मा कहते हैं।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: रुको, संजय! यह शरीर और आत्मा की बातें मुझे मत सुनाओ।
संजय: महाराज...
धृतराष्ट्र: बस इतना बताओ। उसने धनुष उठाया या नहीं?
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)