When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
जहाँ कृष्ण, वहीं विजय
कुरुक्षेत्र · दोनों सेनाओं के बीच
युयुत्सु: हाँ, धर्मराज। मैं भी धृतराष्ट्र का बेटा हूँ। पर मैंने बहुत देखा है। जुआ, वह सभा, वनवास। अब और नहीं देख सकता। मैं आपकी ओर से लड़ूँगा।
दुर्योधन: युयुत्सु, रुक जा! तू एक दासी का बेटा होकर—
युयुत्सु: हाँ, भैया। इसीलिए तो मुझसे कभी किसी ने कुछ पूछा नहीं। आज मैं ख़ुद चुन रहा हूँ।
युधिष्ठिर: आओ, भाई। हम तुम्हें अपनाते हैं। लगता है, महाराज धृतराष्ट्र का वंश तुम्हीं से चलेगा, और उनका श्राद्ध भी तुम्हीं करोगे।
सूत्रधार: नगाड़ों के बीच युयुत्सु पांडवों की ओर चला गया। युधिष्ठिर ने फिर कवच पहना। और युद्ध शुरू हुआ।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात का आख़िरी पहर
संजय: यही था वह पहला दिन, महाराज। मैंने जो देखा, सब कह दिया। बस एक बात और।
धृतराष्ट्र: कहो।
संजय: यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
संजय: जहाँ कृष्ण हैं, और जहाँ धनुष उठाए अर्जुन है, वहीं लक्ष्मी है, वहीं विजय है, वहीं अटल नीति है। यही मेरा मत है, महाराज।
संजय: सुबह होने वाली है। मुझे मैदान लौटना है। कोई संदेश?
सूत्रधार: धृतराष्ट्र ने कुछ नहीं कहा। अर्जुन का मोह उस पहली सुबह मिट गया था। राजा का मोह... उस रात भी बाक़ी था।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)