When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
जो मुझे प्यारा है
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
संजय: जैसी आज्ञा, महाराज। रूप देखने के बाद अर्जुन ने एक सीधा सवाल पूछा।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: केशव, कोई आपको इसी रूप में प्रेम से पूजता है। कोई बिना रूप वाले भगवान का ध्यान करता है। दोनों में कौन बेहतर है?
श्रीकृष्ण: जो मन मुझमें लगाकर, पूरे भरोसे से मुझे याद करते हैं, वे मुझे सबसे पक्के लगते हैं, पार्थ। पर मुझे सबसे प्यारा कौन है, यह सुनो।
श्रीकृष्ण: जो किसी से नफ़रत नहीं करता। सबसे दोस्ती रखता है, सब पर दया करता है। जिसमें मेरा-मेरा और मैं-मैं नहीं। जो सुख-दुख में एक-सा रहे, और माफ़ करना जानता हो।
श्रीकृष्ण: जिससे दुनिया परेशान नहीं होती, और जो दुनिया से परेशान नहीं होता। दोस्त हो या दुश्मन, मान हो या अपमान, जो एक-सा रहे... वह मुझे प्यारा है।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: जो माफ़ कर दे... संजय, यह तो...
संजय: युधिष्ठिर, महाराज?
धृतराष्ट्र: सब कुछ जुए में हारा। तेरह बरस वन में काटे। और लौटकर बस पाँच गाँव माँगे। मेरे बेटे ने वह भी नहीं दिए।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
श्रीकृष्ण: पर ऐसा बनने में एक रुकावट है, पार्थ। हर इंसान को तीन रस्सियाँ बाँधे रहती हैं। और सबसे अच्छी रस्सी भी... आख़िर रस्सी ही है।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)