When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
सारथी मुड़े
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: लगाम कृष्ण के हाथ में थी... तो कृष्ण ने रथ मोड़ा?
संजय: नहीं, महाराज। उन्होंने रथ नहीं मोड़ा। वे लगाम छोड़कर पीछे मुड़े।
धृतराष्ट्र: मुझे लगा था, कृष्ण उसे समझा-बुझाकर ले जाएँगे। झगड़ा टल जाएगा।
संजय: महाराज, आपने अर्जुन की हर बात सुनी। पर उसमें आपने बस अपने बेटों का राज्य सुना।
धृतराष्ट्र: संजय!
संजय: क्षमा, महाराज। व्यास जी ने कहा था, बिना मिलावट के।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
सूत्रधार: कृष्ण उठे और अर्जुन के सामने आकर बैठ गए। कुछ देर कुछ नहीं बोले। बस उसके आँसू देखते रहे।
अर्जुन: आप चुप क्यों हैं, केशव? कुछ कहिए। या मुझे यहाँ से ले चलिए।
श्रीकृष्ण: ले चलूँ? कहाँ, पार्थ? उन भाइयों के पास, जो तुम्हारे भरोसे यहाँ खड़े हैं? या उस पांचाली के पास, जो तेरह बरस से न्याय की राह देख रही है?
अर्जुन: केशव...
श्रीकृष्ण: इस कठिन घड़ी में यह मोह तुम्हें कहाँ से आ घेरा, अर्जुन? यह न बड़े लोगों को शोभा देता है, न स्वर्ग दिलाता है, न यश।
श्रीकृष्ण: क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ... ऐसे हिम्मत हारना तुम्हें शोभा नहीं देता, पार्थ। दिल की यह छोटी-सी कमज़ोरी छोड़ो। उठो, अर्जुन!
All chapters (48)
Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)
