When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
मैं काल हूँ
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात, बारिश
संजय: हाँ, महाराज। आपके बेटे। जैसे नदियाँ दौड़कर समुद्र में जा गिरती हैं। जैसे पतंगे जलती लौ में ख़ुद कूद पड़ते हैं।
धृतराष्ट्र: ख़ुद कूद पड़ते हैं...
धृतराष्ट्र: धीरे, संजय... धीरे बोलो... कोई सुन लेगा।
संजय: यहाँ कोई नहीं है, महाराज। बस आप हैं, और मैं।
धृतराष्ट्र: और वह? वह भी नहीं है? जो सब देखता है?
संजय: वह तो हर जगह है, महाराज। यही तो अर्जुन ने देखा था।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ, विराट रूप
अर्जुन: आप कौन हैं, हे देव, इस भयानक रूप में? मुझे बताइए। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मैं समझ नहीं पा रहा, आप करना क्या चाहते हैं।
श्रीकृष्ण: मैं काल हूँ, पार्थ। वह समय, जो एक दिन सबको ले जाता है। बढ़ा हुआ काल, जो दुनिया को समेटने आया है। जो आज यहाँ खड़े हैं, उनका समय पूरा हो चुका है।
अर्जुन: काल... और मैं? मेरे बाण?
श्रीकृष्ण: और सुनो, पार्थ। तुम न भी लड़ो... तब भी इन दोनों सेनाओं में खड़े इन योद्धाओं में से कोई नहीं बचेगा।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)
