When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
मैं आपका शिष्य हूँ
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: आप ही बताइए, केशव। आज तक मैंने आपको सखा कहा। आज शिष्य बनकर कहता हूँ... मैं आपकी शरण में हूँ। मुझे सिखाइए।
श्रीकृष्ण: शिष्य? मेरे सखा अर्जुन?
अर्जुन: हाँ। सखा से तो बहस की जाती है, केशव। शिष्य बस सुनता है, और मानता है। धरती का बिना शत्रु वाला राज मिल जाए, देवताओं का राज मिल जाए, तब भी यह शोक नहीं जाएगा जो मुझे भीतर से सुखा रहा है।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: शिष्य? युद्ध के बीच? सारथी को गुरु बना लिया? इतने बड़े धनुर्धर ने?
संजय: हाँ, महाराज। जिस रथ पर वह योद्धा बनकर चढ़ा था, उसी पर शिष्य बनकर बैठ गया।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: पर एक बात सुन लीजिए, गोविंद। मैं नहीं लड़ूँगा।
सूत्रधार: इतना कहकर अर्जुन चुप हो गए। दोनों सेनाएँ खड़ी रहीं। हवा तक जैसे थम गई।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: उसने कह दिया... मैं नहीं लड़ूँगा। तो युद्ध वहीं रुक गया होगा? मेरे बेटे बिना लड़े—
संजय: रुकिए, महाराज।
धृतराष्ट्र: क्या हुआ? कृष्ण नाराज़ हुए? उसे डाँटा?
संजय: नहीं, महाराज... कृष्ण मुस्कुराए।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)