When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
लोभ की पट्टी
कुरुक्षेत्र · दोनों सेनाओं के बीच
अर्जुन: धृतराष्ट्र के बेटों को मारकर हमें क्या ख़ुशी मिलेगी, जनार्दन? इन्होंने अन्याय किया है, फिर भी इन्हें मारकर हमें पाप ही लगेगा।
अर्जुन: लोभ ने इनकी आँखों पर पट्टी बाँध दी है। इन्हें कुल का नाश नहीं दिखता, मित्र से धोखे का पाप नहीं दिखता। पर हम तो देख रहे हैं, केशव... फिर हम क्यों न रुकें?
धृतराष्ट्र: लोभ? मेरे बेटों की आँखों पर पट्टी?
संजय: ये अर्जुन के शब्द हैं, महाराज, मेरे नहीं।
धृतराष्ट्र: पट्टी... इस महल में एक पट्टी तो बरसों से बँधी है, संजय।
अर्जुन: कुल टूटता है, तो उसकी पुरानी रीतें टूट जाती हैं। रीतें टूटें, तो धर्म बिखर जाता है, और घर-घर में अधर्म फैल जाता है।
संजय: कृष्ण चुप थे, महाराज। बस सुनते रहे। जैसे चाहते हों कि सारा ज़हर एक बार बाहर आ जाए।
अर्जुन: हाय! हम कितना बड़ा पाप करने चले थे। राज्य के सुख के लोभ में अपनों को मारने खड़े हो गए।
अर्जुन: अच्छा तो यह होगा, केशव, कि मैं हथियार न उठाऊँ। कोई बचाव भी न करूँ। और धृतराष्ट्र के बेटे हथियार लेकर इसी रथ पर मुझे मार डालें।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)
