When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
धनुष रख दिया
कुरुक्षेत्र · दोनों सेनाओं के बीच
सूत्रधार: इतना कहकर अर्जुन ने धनुष और बाण एक ओर रख दिए। और शोक में डूबे, रथ के पिछले हिस्से में बैठ गए।
अर्जुन: बस, केशव। मुझसे नहीं होगा।
संजय: दोनों सेनाओं के आगे, महाराज, दुनिया का सबसे बड़ा धनुर्धर सिर झुकाए बैठा था। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। और कृष्ण चुपचाप उसे देख रहे थे।
कौरव सेना का अगला मोर्चा · पहले दिन की सुबह
दुर्योधन: देखिए, पितामह। अर्जुन बैठ गया। डर गया है वह!
भीष्म पितामह: चुप रहो, दुर्योधन। वह डरा नहीं है।
दुर्योधन: तो फिर क्यों रो रहा है वह?
भीष्म पितामह: उसे हम दिखाई दे रहे हैं, बेटा। अपने दिखाई दे रहे हैं। जैसे तुम्हें कभी नहीं दिखे।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: बैठ गया... धनुष रखकर...
संजय: हाँ, महाराज।
धृतराष्ट्र: और पितामह ने यह कहा था? मेरे बेटे से? कि उसे अपने कभी नहीं दिखे?
संजय: यही कहा था।
धृतराष्ट्र: काश... काश वह उसी घड़ी रथ मोड़कर लौट जाता। न युद्ध होता, न पितामह गिरते, और राज्य मेरे बेटों के पास रहता।
संजय: वह लौट भी जाता, महाराज... पर लगाम उसके हाथ में नहीं थी।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)
