When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
सखा लौट आए
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
श्रीकृष्ण: डरो मत, अर्जुन। घबराओ मत। यह रूप मैंने तुम पर प्रसन्न होकर दिखाया था। तुमसे पहले किसी ने इसे नहीं देखा। न वेद पढ़कर, न यज्ञ करके, न दान से, न तप से।
श्रीकृष्ण: अब डर छोड़ दो, और फिर से मेरा वही रूप देखो।
संजय: महाराज, पहले उन्होंने चार भुजाओं वाला रूप दिखाया। और फिर... वही साँवला सारथी। धूल भरे कपड़े। हाथ में लगाम।
अर्जुन: आपका यह शांत, मनुष्य वाला रूप देखकर अब मैं होश में आया हूँ, जनार्दन। अपने आप में लौट आया हूँ।
श्रीकृष्ण: वह रूप सिर्फ़ सच्चे प्रेम से देखा जाता है, पार्थ। किसी और रास्ते से नहीं।
अर्जुन: केशव... आपके हाथ में फिर से वही लगाम है। जैसे कुछ हुआ ही न हो।
श्रीकृष्ण: हुआ तो है, पार्थ। अब तुम जानते हो कि लगाम किसके हाथ में है।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: संजय... तुम्हारी आवाज़ क्यों काँप रही है?
संजय: क्योंकि मैंने भी देखा था, महाराज। मेरे रोंगटे अब भी खड़े हैं।
धृतराष्ट्र: संजय... उस मुँह में... क्या दुर्योधन भी था?
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)