When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
धुएँ में ढकी आग
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: कामना और क्रोध... बस ये दो?
श्रीकृष्ण: यही दो इंसान के सबसे बड़े दुश्मन हैं, पार्थ। इनकी भूख कभी नहीं भरती। जैसे धुआँ आग को ढक लेता है, जैसे धूल आईने को ढक लेती है, वैसे ही कामना समझ को ढक लेती है।
अर्जुन: और ये रहते कहाँ हैं? कहाँ से वार करते हैं?
श्रीकृष्ण: इंद्रियों में, मन में, बुद्धि में। वहीं बैठकर आदमी को भरमाते हैं। इसलिए पहले इंद्रियों को साधो, फिर इस दुश्मन को मार डालो।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: धुआँ आग को ढक लेता है... मेरी आग तो कब की बुझ गई, संजय। बस धुआँ बचा है।
संजय: धुआँ हटे, तो आग फिर दिख जाती है, महाराज।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: केशव... यह जो आप बता रहे हैं, यह योग... यह नया है? आपने यह कहाँ से जाना?
श्रीकृष्ण: नया नहीं, पार्थ। बहुत पुराना है। यही योग मैंने सबसे पहले सूर्य को बताया था। विवस्वान को।
अर्जुन: सूर्य को? पर केशव, आपका जन्म तो कुछ ही बरस पहले हुआ है। सूर्य तो न जाने कब से—
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)