When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
भीख माँगकर जीना
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: उठूँ, मधुसूदन? और उठकर किस पर बाण चलाऊँ? पितामह पर? गुरु द्रोण पर? ये तो पूजा के योग्य हैं।
श्रीकृष्ण: ये तुम्हारे सामने शस्त्र लेकर खड़े हैं, पार्थ।
अर्जुन: तो खड़े रहें। ऐसे बड़ों को मारकर जीने से अच्छा है, भीख माँगकर पेट भर लूँ। इन्हें मारकर जो भोजन मिलेगा, उसमें इनका ख़ून सना होगा।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: भीख? पांडु का बेटा भीख माँगने की बात कर रहा था?
संजय: हाँ, महाराज। और कहते हुए उसकी आवाज़ में शर्म नहीं थी। बस थकान थी।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: मुझे यह भी नहीं पता, केशव, कि हमारे लिए क्या भला है। हम जीतें, या वे हमें जीत लें। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहेंगे, वही सामने खड़े हैं।
श्रीकृष्ण: तो चाहते क्या हो?
अर्जुन: यही तो नहीं जानता। मेरा स्वभाव कमज़ोरी के नीचे दब गया है। धर्म क्या है, यह भी नहीं सूझ रहा।
अर्जुन: जो सही हो, जो सच में मेरे भले का हो... वह अब आप ही—
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)