When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
हज़ार सूरज
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ, विराट रूप
संजय: महाराज... उस घड़ी मैंने भी देखा।
धृतराष्ट्र: क्या? क्या देखा?
संजय: अगर आकाश में एक साथ हज़ार सूरज उग आएँ, तो शायद वैसा उजाला हो। रथ पर कृष्ण नहीं थे, महाराज। पूरा आकाश था।
संजय: अनगिनत मुँह। अनगिनत आँखें। अनगिनत हाथ, हर हाथ में चमकता शस्त्र। कहीं मुकुट, कहीं गदा, कहीं चक्र। सारी दुनिया, अलग-अलग होकर भी, एक ही शरीर में खड़ी थी।
धृतराष्ट्र: और मैं... मैंने वे आँखें लौटा दी थीं।
धृतराष्ट्र: और अर्जुन? वह क्या कर रहा था?
संजय: उसके रोंगटे खड़े थे। उसने सिर झुकाया, और हाथ जोड़ लिए। और मैं, महाराज, उस रथ से कोसों दूर, अपनी जगह पर ही घुटनों के बल गिर पड़ा था।
अर्जुन: हे देव... मैं आपके शरीर में सारे देवताओं को देख रहा हूँ। ब्रह्मा जी को कमल पर बैठे देख रहा हूँ। ऋषियों को, नागों को, पूरी सृष्टि को।
अर्जुन: आपके हाथ, मुँह, आँखें... हर तरफ़, बिना किसी किनारे के। मैं ढूँढ रहा हूँ, पर कहीं दिखता नहीं... न शुरू, न बीच, न अंत—
All chapters (48)
Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)
