When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
हे सखा
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ, विराट रूप
अर्जुन: ऐसे ही तो बुलाता था मैं आपको। सखा समझकर। आपकी इस महिमा को जाने बिना, कभी प्रेम में, कभी लापरवाही में।
अर्जुन: खेलते हुए, सोते हुए, बैठे हुए, खाते हुए... अकेले में या सबके सामने, अगर कभी हँसी-मज़ाक़ में आपका अपमान किया हो... तो मुझे माफ़ कर दीजिए।
अर्जुन: जैसे पिता बेटे को माफ़ करता है, जैसे दोस्त दोस्त को, जैसे कोई अपने सबसे प्यारे को... वैसे ही मुझे माफ़ कर दीजिए, देव।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात, बारिश
धृतराष्ट्र: माफ़ी माँग रहा था? किस बात की? उसने तो कोई पाप नहीं किया था।
संजय: बस यही, महाराज, कि जो रोज़ उसके पास बैठा था, उसे उसने कभी पूरा नहीं पहचाना।
धृतराष्ट्र: रोज़ पास बैठा था...
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ, विराट रूप
अर्जुन: जो पहले कभी नहीं देखा, वह देखकर मैं धन्य हूँ। पर मेरा मन डर से काँप रहा है। अपना वही रूप दिखाइए, देव। मुकुट, गदा और चक्र वाला।
संजय: और फिर, महाराज... वह तेज सिमटने लगा।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)