When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
दुर्योधन की गिनती
कुरुक्षेत्र · पहले दिन की भोर
संजय: गुरु द्रोण के पास, महाराज। जो कौरवों के भी गुरु थे और पांडवों के भी।
दुर्योधन: गुरुदेव... देखिए पांडु के बेटों की यह बड़ी सेना। इसे आपके ही बुद्धिमान शिष्य, द्रुपद के बेटे धृष्टद्युम्न ने सजाया है।
धृतराष्ट्र: आपके ही शिष्य ने? उसने गुरु को यह क्यों याद दिलाया?
संजय: ताना था, महाराज। और शायद डर भी।
दुर्योधन: वहाँ भीम हैं, अर्जुन हैं। सात्यकि, राजा विराट, बूढ़े द्रुपद। धृष्टकेतु, चेकितान, काशी के राजा। कुंतिभोज, अभिमन्यु, द्रौपदी के पाँचों बेटे... सब के सब महारथी।
धृतराष्ट्र: उसने पहले उनकी गिनती की? अपनी नहीं?
संजय: पहले उनकी। फिर जैसे अपने आप को समझाने लगा।
दुर्योधन: और हमारी ओर... आप हैं, गुरुदेव। पितामह भीष्म हैं, कर्ण हैं, कृपाचार्य हैं। अश्वत्थामा, विकर्ण, भूरिश्रवा। और न जाने कितने वीर, जो मेरे लिए जान देने आए हैं।
धृतराष्ट्र: तो डर किस बात का था?
संजय: यह उसने नहीं कहा, महाराज। पर उसकी आवाज़ में था।
दुर्योधन: सुनो सब! अपनी-अपनी जगह पर डटे रहना। और हर हाल में, बस पितामह की रक्षा करना।
संजय: तभी, महाराज, सेना के सबसे आगे से एक गरज उठी... जैसे कोई बूढ़ा शेर जाग गया हो।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)