When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
एक पत्ता, एक फूल
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात, बारिश
संजय: युद्ध के बीच भी साथ खड़ा रहता है, महाराज। रथ हाँकता हुआ।
धृतराष्ट्र: और उसे पाने का रास्ता? बड़े यज्ञ? सोने का दान?
संजय: यही अर्जुन ने भी सोचा था। पर कृष्ण ने कुछ और कहा।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
श्रीकृष्ण: कोई प्रेम से मुझे एक पत्ता दे, एक फूल, एक फल, या थोड़ा-सा पानी... तो मैं उसे प्रेम से ले लेता हूँ, पार्थ।
अर्जुन: बस इतना?
श्रीकृष्ण: इतना ही। मैं चीज़ नहीं देखता, देने वाले का मन देखता हूँ।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात, बारिश
धृतराष्ट्र: एक पत्ता... संजय, मैंने सोने के कलश चढ़ाए। हज़ारों गायें दान कीं। पर कभी एक पत्ता भी प्रेम से नहीं चढ़ाया। हर बार कुछ माँगा। बेटों के लिए।
संजय: अभी भी देर नहीं हुई, महाराज।
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: केशव, आप कहते हैं, सब आपमें है। तो बताइए, किन-किन रूपों में आपको याद करूँ? आप कहाँ-कहाँ हैं?
श्रीकृष्ण: मेरी कोई गिनती नहीं, पार्थ। पर कुछ बताता हूँ। पहाड़ों में मैं हिमालय हूँ। नदियों में गंगा। पेड़ों में पीपल। ऋतुओं में वसंत।
अर्जुन: और... हम लोगों में?
श्रीकृष्ण: वृष्णियों में मैं वासुदेव हूँ। और पांडवों में, पार्थ... मैं धनंजय हूँ।
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)