When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
व्यास जी की आँखें
हस्तिनापुर का महल · युद्ध से कुछ दिन पहले की शाम
सूत्रधार: युद्ध से कुछ दिन पहले, इसी महल में महर्षि वेदव्यास आए थे। वही, जिनसे स्वयं धृतराष्ट्र का जन्म हुआ था।
वेदव्यास: पुत्र, तुम्हारे बेटों और पांडवों का समय आ गया है। कुरुक्षेत्र में बड़ा संहार होगा। अगर देखना चाहो, तो मैं तुम्हें आँखें दे सकता हूँ।
धृतराष्ट्र: आँखें? नहीं, मुनिवर। अपने ही कुल का कटना मैं नहीं देखना चाहता। बस इतना चाहता हूँ कि सब सुन सकूँ।
वेदव्यास: जैसी तुम्हारी इच्छा। तो यह दृष्टि संजय को देता हूँ।
संजय: मुझे, मुनिवर?
वेदव्यास: तुम्हें। युद्ध में जो होगा, दिन में या रात में, सामने या छिपकर, तुम सब देखोगे। मन में सोची बात भी तुमसे छिपी नहीं रहेगी। कोई शस्त्र तुम्हें नहीं छुएगा, थकान तुम्हें नहीं घेरेगी।
संजय: मुनिवर... मेरी आँखों के आगे... सब खुल रहा है।
वेदव्यास: जो देखो, बिना मिलावट के कहना। राजा को अच्छा लगे या न लगे।
धृतराष्ट्र: मुनिवर, क्या अब भी कोई रास्ता—
वेदव्यास: रास्ता तुम्हारे हाथ में था, पुत्र। अब भी है। पर तुम बेटों को रोकोगे नहीं, मैं जानता हूँ।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: रोक नहीं पाया। बोलो, संजय। पहली सुबह सबसे पहले क्या हुआ?
संजय: पहली सुबह, महाराज, दुर्योधन अपने सेनापति के पास नहीं गया।
धृतराष्ट्र: तो किसके पास गया?
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Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)
