When Arjuna Laid Down His Bow
Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.
मन हवा जैसा
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: केशव! वे बुला रहे हैं... और मेरा हाथ अब भी काँप रहा है। यह मन मेरे वश में नहीं है।
श्रीकृष्ण: उस शंख की ओर मत देखो, पार्थ। मेरी ओर देखो।
श्रीकृष्ण: आदमी को ख़ुद ही ख़ुद को उठाना होता है। ख़ुद को गिरने मत दो। जिसने मन को जीत लिया, उसका मन उसका सबसे अच्छा दोस्त है। जिसने नहीं जीता, उसका सबसे बड़ा दुश्मन।
श्रीकृष्ण: जहाँ हवा न चलती हो, वहाँ दीये की लौ नहीं काँपती। सधा हुआ मन भी वैसे ही नहीं काँपता।
अर्जुन: केशव, सच कहूँ? यह मन ही तो हवा है। चंचल है, ज़िद्दी है, भीतर तक मथ डालता है। इसे रोकना हवा को मुट्ठी में बाँधने जैसा है।
श्रीकृष्ण: तुम ठीक कहते हो, पार्थ। मन बड़ी मुश्किल से वश में आता है।
अर्जुन: फिर?
श्रीकृष्ण: फिर भी आता है। अभ्यास से, और वैराग्य से। यानी भटके तो रोज़ लौटाकर लाओ। और जो चीज़ खींचती है, उससे लगाव धीरे-धीरे कम करो।
हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात
धृतराष्ट्र: रोज़ लौटाकर लाओ...
कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ
अर्जुन: और अगर कोई कोशिश करे, केशव... पूरे मन से चले, पर बीच रास्ते में गिर जाए? न इधर का रहे, न उधर का?
All chapters (48)
Tradition & source notes
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)