ॐBhakti Aanganभक्ति आंगन
Bhagavad Gita

When Arjuna Laid Down His Bow

Between duty and attachment, Arjuna pauses. Krishna’s conversation begins.

Original Hindi text48 chapters
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Chapter 27

मन हवा जैसा

कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ

अर्जुन: केशव! वे बुला रहे हैं... और मेरा हाथ अब भी काँप रहा है। यह मन मेरे वश में नहीं है।

श्रीकृष्ण: उस शंख की ओर मत देखो, पार्थ। मेरी ओर देखो।

श्रीकृष्ण: आदमी को ख़ुद ही ख़ुद को उठाना होता है। ख़ुद को गिरने मत दो। जिसने मन को जीत लिया, उसका मन उसका सबसे अच्छा दोस्त है। जिसने नहीं जीता, उसका सबसे बड़ा दुश्मन।

श्रीकृष्ण: जहाँ हवा न चलती हो, वहाँ दीये की लौ नहीं काँपती। सधा हुआ मन भी वैसे ही नहीं काँपता।

अर्जुन: केशव, सच कहूँ? यह मन ही तो हवा है। चंचल है, ज़िद्दी है, भीतर तक मथ डालता है। इसे रोकना हवा को मुट्ठी में बाँधने जैसा है।

श्रीकृष्ण: तुम ठीक कहते हो, पार्थ। मन बड़ी मुश्किल से वश में आता है।

अर्जुन: फिर?

श्रीकृष्ण: फिर भी आता है। अभ्यास से, और वैराग्य से। यानी भटके तो रोज़ लौटाकर लाओ। और जो चीज़ खींचती है, उससे लगाव धीरे-धीरे कम करो।

हस्तिनापुर का महल · दसवीं रात

धृतराष्ट्र: रोज़ लौटाकर लाओ...

कुरुक्षेत्र · अर्जुन का रथ

अर्जुन: और अगर कोई कोशिश करे, केशव... पूरे मन से चले, पर बीच रास्ते में गिर जाए? न इधर का रहे, न उधर का?

All chapters (48)
1. पितामह गिर गए2. व्यास जी की आँखें3. दुर्योधन की गिनती4. शंखों का जवाब5. रथ बीच में6. सामने कौन खड़ा था7. गांडीव गिर गया8. लोभ की पट्टी9. धनुष रख दिया10. सारथी मुड़े11. भीख माँगकर जीना12. मैं आपका शिष्य हूँ13. जो कभी नहीं मरता14. पुराने कपड़े15. पिता का सवाल16. कर्म पर हक़17. किसान का बीज18. कछुए की तरह19. सीढ़ी जो नीचे जाती है20. अर्जुन की उलझन21. एक पल भी नहीं22. मिथिला जल रही है23. मुझे कुछ नहीं चाहिए24. धुएँ में ढकी आग25. युग-युग में26. ज्ञान की तलवार27. मन हवा जैसा28. जो बीच में गिर जाए29. पानी का स्वाद30. एक पत्ता, एक फूल31. एक छोटा-सा हिस्सा32. हज़ार सूरज33. काँपते लोक34. मैं काल हूँ35. बस निमित्त बनो36. हे सखा37. सखा लौट आए38. एक संदेश39. जो मुझे प्यारा है40. तीन रस्सियाँ41. जैसा चाहो, वैसा करो42. मेरी शरण आओ43. मोह मिट गया44. निहत्थे युधिष्ठिर45. पितामह का आशीर्वाद46. गुरु का वचन47. कोई आएगा?48. जहाँ कृष्ण, वहीं विजय
Tradition & source notes

श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 1–18), महाभारत, भीष्म पर्व (संजय को दिव्य दृष्टि, भीष्म का पतन, युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना)

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